पैसे की कहानी और जीवन में पैसे का महत्व

 


यह कहानी शुरू होती है एक ट्रेन के सफर से। ट्रेन में बहुत ज्यादा भीड़ थी। सपना को अचानक अपने पिता की तबियत बहुत ज्यादा बिगड़ने के कारण, उन्हें देखने के लिए मायके जाना पड़ रहा था, और रिजर्वेशन नहीं मिलने के कारण उसे जनरल डिब्बे में सफर करना पड़ रहा था। जैसे तैसे उसे दरवाजे के पास वाली सीट पर जगह मिल पाई थी। सपना जहां बैठी थी, उसके ठीक सामने दरवाजे के पास ही एक पच्चीस साल की महिला अपने लगभग देढ़ साल के बच्चे को लेकर, नीचे बैठी हुई थी। उसके पास कुछ पोटलियां भी थी। चेहरे मोहरे से वह महिला बहुत ही गरीब लग रही थी।



उस महिला ने एक रंग बिरंगा लहंगा और काली चोली पहनी हुई थी और एक लाल रंग की चुनर से अपने सिर को ढंक कर रखा था। वह अपने बच्चे से अपनी भाषा में बात करते हुए उसे खेल खिला रही थी। वे दोनों मां बेटा अपने आप में इतने खुश और मस्त थे कि उन्हें अपने आसपास क्या चल रहा है, उससे कोई भी मतलब नहीं था।


सपना उन्हें हंसते और खेलते हुए देखकर, बहुत खुश हो रही थी। वह काफी समय से उन दोनों को ही देख रही थी।


" कितने खुश हैं ना ये दोनों आपस में, सच ही कहते हैं लोग कि खुश रहने के लिए केवल पैसा ही जरुरी नहीं होता है, बिना पैसे के भी इंसान इतना खुश रह सकता है, तो फिर पैसे की जरूरत ही क्या है?'




सपना ने गहरी सांस लेते हुए मन ही मन सोचा।


लेकिन सपना ने सोचा ही था और अचानक वह महिला अपने बच्चे के साथ खेलते खेलते रुक गई और सपना की ओर आंखें बड़ी बड़ी करके घूर कर देखने लगी। सपना को बहुत आश्चर्य हुआ कि अब तक तो वह महिला बिलकुल ही केवल अपने बच्चे में ही खोई हुई थी। सपना या किसी और की तरफ उसका बिल्कुल भी ध्यान नहीं था। उसने अपने बच्चे पर से नजर हटा कर किसी को देखा तक नहीं था। और अचानक इसे क्या हो गया जो वह घूर कर देखने लगी। उसकी बड़ी बड़ी आंखों में इतना ज्यादा गुस्सा भर आया था मानो वह नजरों से ही सपना को खा जाएगी, और तो और हैरानी इस बात की थी कि इतने सारे लोगों में वह केवल सपना को ही घूर रही थी।


कुछ देर तक उस महिला की ओर देखने के बाद, सपना ने उस पर से अपनी नज़र हटा ली और दूसरी तरफ देखने लगी। लेकिन फिर भी उसे महसूस हो रहा था कि वह महिला अभी भी सपना को ही घूर रही है। वह बच्चा भी एकदम से शांत हो गया था। सपना ने एक बार फिर से नजर घुमाई और उस महिला की ओर देखा तो वह अभी भी और भी ज्यादा गुस्से सपना को ही घूर कर देख रही थी, वह बच्चा भी बिल्कुल हलचल नहीं कर रहा था और वह भी सपना की ओर ही देख रहा था। अब तो सपना का सारा आश्चर्य, डर में बदल गया था। उसे अब उस महिला से बहुत ही ज्यादा डर लग रहा था।



हैरानी की बात यह भी थी कि इतने सारे लोगों की भीड़ में भी किसी का भी ध्यान उस महिला और उसके बच्चे पर नहीं था। मानो वह केवल सपना को ही दिखाई दे रही थी।


बहुत देर तक ऐसा ही चलता रहा। वह महिला और उसका बच्चा एकटक बस सपना को ही देख रहे थे। सपना ने डर कर अपनी जगह बदलने का सोचा लेकिन ट्रेन के उस जनरल डिब्बे में इतनी ज्यादा भीड़ थी कि उसके लिए वहां से उठना और उठ कर दूसरी जगह पर जाना बिल्कुल ही नामुमकिन सा था। इस चक्कर में बड़ी मुश्किल से हाथ आई यह जगह भी हाथ से निकल जाती और चार घंटे का पूरा सफर उसे खड़े रह कर ही काटना पड़ता। इसलिए उस महिला और उसके बच्चे को इग्नोर करके दूसरी ओर देखने के अलावा उसके पास और कोई भी चारा नहीं था।


बीच बीच में सपना उस महिला को देख ही लेती थी, और हर बार वह उसे घूरते हुए ही मिलती थी। लेकिन अचानक वह महिला कही गायब हो गई और सपना को दिखाई नहीं दी।


धीरे धीरे सफर खत्म होने को था और हर स्टेशन पर लोग उतरने ज्यादा और चढ़ने कम हो गए थे। एक फेमस स्टेशन पर तो ऐसा हुआ कि उस डिब्बे के बहुत से लोग वहां पर ही उतर गए। डब्बा बहुत हद तक खाली हो गया था और बाकी लोगों को बैठने की अच्छी खासी जगह मिल गई थी। बल्कि कई सीटें भी खाली हो गई थी। यूं भी अगला स्टेशन जहां पर सपना को उतरना था, वह आखरी स्टेशन ही था जो अब ढाई  घंटे की ही दूरी पर था।



रात के साढ़े दस बज गए थे। डिब्बे में जितने लोग बचे हुए थे वे सभी आखरी स्टेशन पर ही उतरने वाले थे, तो सभी अंधेरा कर के आराम से सो गए थे। सपना के सामने की सीट भी खाली हो गई थी। वह महिला जब से दिखाई नहीं दी थी, सपना एकदम ही रिलेक्स हो गई थी। और आराम से आंखें बंद कर के बैठ गई थी। तभी उसे फिर से महसूस हुआ कि कोई उसे घूर रहा है। सपना बंद आंखों से भी ये महसूस कर रही थी। सपना ने हड़बड़ा कर आंखें खोली तो उसके एकदम सामने वह महिला अपने बच्चे के साथ बैठी उसकी ओर खा जाने वाली नजर से देख रही थी। उसका बच्चा भी बस सपना को ही घूरे जा रहा था। अब वह महिला तरह तरह के चित्र विचित्र हावभाव बनाने लगी। वह कभी हंसती तो कभी रोती थी, कभी चुप हो जाती तो कभी चिल्लाने लगती थी। धीरे धीरे उसके शरीर पर जगह जगह पर चोट के निशान बन गए थे, जिनमें से खून भी बह रहा था, उसके चेहरे पर भी नोच खसोट के कारण खून रिसने लगा था। उसके बाल बिखरे हुए थे और माथे का कुंकुम भी फैला हुआ था। यहां तक कि वह बच्चा भी बुरी तरह से घायल था। वे दोनों बहुत ही भयानक लग रहे थे।


उन दोनों की हालत देखकर सपना एकदम बर्फ की तरह जम सी गई, वह चिल्लाने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसकी आवाज भी एकदम से बंद सी हो गई थी। ट्रेन में बाकी लोगों को बिल्कुल भी कोई फरक नहीं पड़ रहा था।


वह महिला अब सपना के बाजु में आकर बैठ गई और उसकी आंखों में झांकते हुए गुस्से से बोली,


" पैसा कुछ भी नहीं होता है ना, और पैसे के बिना भी खुश रहा जा सकता है ना, तो फिर देख…., देख हमारी यह हालत कैसे हो गई है। हम दोनों ही आज इस हालत में है तो इसका कारण हमारी ग़रीबी है। मेरे पति ने पैसों की तंगी और कर्ज से से तंग आकर मेरे साथ बुरी तरह मारपीट की और मेरे छोटे से बच्चे के साथ मुझे आधी रात को घर से निकाल दिया और स्टेशन पर लाकर इसी ट्रेन में बैठा दिया।  ट्रेन में ही मुझे तरह तरह की नजरों का सामना करना पड़ रहा था, तो आगे क्या होगा? यह सोचकर मेरा दिल बैठा जा रहा था। मैं कहां जा रही हूं, मुझे यह भी पता नहीं था। इसलिए मैंने अपने बच्चे के साथ चलती हुई ट्रेन से कूद कर आत्महत्या कर ली थी।


सपना स्तब्ध होकर उसकी बात सुन रही थी। इतना कहकर वह महिला उठी और भारी कदमों से चलकर ट्रैन के दरवाजे तक पहुंची। और पीछे मुड़कर सपना की ओर देखा। सपना वैसे ही स्तब्ध होकर उस औरत को देख रही थी। वह औरत दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो जाती है और अपने बच्चे के साथ ट्रेन से कूदने की तैयारी में ही थी कि सपना भागकर उसके पास जाती है और उसको पकड़ने की कोशिश करती है। लेकिन वह औरत हंसते हंसते नीचे कूद जाती है और अंधेरे में गायब हो जाती है।

सपना भरी कदमों से चलकर अपनी सीट पर आकर बैठ जाती है तभी वहां से टीसी गुजरता है तो वह उससे उस औरत के बारे में बताती है। टीसी सपना को बताता है कि वह औरत तो रोज ऐसा ही करती है, वह भूत है और हर किसी को नहीं दिखती हैं। लेकिन किसी को कुछ नहीं करती है। इसलिए आप निश्चिंत रहो। वो कल फिर इसी डब्बे में होगी।


 

 

 

 

 

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